उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nasheb-e-hijr mein din iKHtitam karte hue

नशेब-ए-हिज्र में दिन इख़्तिताम करते हुए

نشیب ہجر میں دن اختتام کرتے ہوئے

शायर: Naeem Gilani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नशेब-ए-हिज्र में दिन इख़्तिताम करते हुए
मैं ख़ुद में डूबता जाता था शाम करते हुए

हर एक लहर है अपने इसी बहाओ में
मैं थक गया तिरे दरिया को राम करते हुए

बरस पड़ा जो किसी रोज़ मुझ पे अक्स मिरा
दरून-ए-आइना-ए-ख़ाना क़याम करते हुए

मिरे सुकूत को दोहराने वाले ये दर-ओ-बाम
सुनाई देने लगे हैं कलाम करते हुए

तमाम-उम्र तिरी रहगुज़र पे बैठ रहा
मिरा ग़ुबार तिरा एहतिराम करते हुए

ये ख़ामुशी है तो रुकिए बग़ौर सुनते हुए
सुख़नवरी है तो चलिए तमाम करते हुए

गुरेज़-पाई की हद से गुज़र गया था वो शख़्स
'नईम' दूर से मुझ को सलाम करते हुए