उर्दू शायरी · ग़ज़ल

naqab-e-gham se na abr-e-nashat se nikla

नक़ाब-ए-ग़म से न अब्र-ए-नशात से निकला

نقاب غم سے نہ ابر نشاط سے نکلا

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नक़ाब-ए-ग़म से न अब्र-ए-नशात से निकला
वो चाँद हूँ कि ख़ुद अपनी ही ज़ात से निकला

ये गर्म दिन कि दर आया है तेरी आँखों में
मिरी जुदाइयों की सर्द रात से निकला

ये क्या फ़ुसूँ है कि सुब्ह-ए-गुरेज़ का पहलू
शब-ए-विसाल तिरी बात बात से निकला

चलो ये 'अक्स भी आईने से हुआ रुख़्सत
चलो ये बुत भी मिरे सोमनात से निकला

बस इक सदा रही दश्त-ए-अबद पे साया-फ़गन
बस एक शख़्स भरी काएनात से निकला