उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nahin muqarrar koi sipahi dayar-e-dil mein

नहीं मुक़र्रर कोई सिपाही दयार-ए-दिल में

نہیں مقرر کوئی سپاہی دیار دل میں

शायर: Parvez Muzaffar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नहीं मुक़र्रर कोई सिपाही दयार-ए-दिल में
फ़क़ीर करते हैं बादशाही दयार-ए-दिल में

ज़रा मोहब्बत से मेरे सीने पे हाथ रख दो
मची हुई है बड़ी तबाही दयार-ए-दिल में

यहाँ समझता नहीं मोहब्बत को जुर्म कोई
नहीं चलेगी तिरी गवाही दयार-ए-दिल में

'अदालत-ए-'इश्क़ ने कहा 'अक़्ल को झिड़क कर
ख़ता से बढ़ कर है बे-गुनाही दयार-ए-दिल में

सलाम करते हैं लोग 'परवेज़' को अदब से
जुनूँ ही करता है सरबराही दयार-ए-दिल में