उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi main KHud se hi laDta hun zindagi se kabhi

कभी मैं ख़ुद से ही लड़ता हूँ ज़िंदगी से कभी

کبھی میں خود سے ہی لڑتا ہوں زندگی سے کبھی

शायर: Nabil Syed5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी मैं ख़ुद से ही लड़ता हूँ ज़िंदगी से कभी
मैं काम होश से लेता हूँ बे-ख़ुदी से कभी

न मार मुझ को कभी ऐ सनम तू ठुकरा कर
जला के दिल को कभी मार दिल-लगी से कभी

कभी हुए न उजाले मुझे मयस्सर जब
न जाने क्यूँ नहीं बनती है तीरगी से कभी

कभी तो मुझ में है दरिया कभी तो सहरा है
डरूँ कभी मैं रवानी से तिश्नगी से कभी

'नबील' तेरे लिए ज़िंदगी है कोह-ए-गिराँ
इसे तू चढ़ नहीं पाएगा ख़स्तगी से कभी