उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na usko bhul pae hain na humne yaad rakkha hai

न उस को भूल पाए हैं न हम ने याद रक्खा है

نہ اس کو بھول پائے ہیں نہ ہم نے یاد رکھا ہے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न उस को भूल पाए हैं न हम ने याद रक्खा है
दिल-ए-बर्बाद को इस तरह से आबाद रक्खा है

झमेले और भी सुलझाने वाले हैं कई पहले
और उस के वस्ल की ख़्वाहिश को सब से बाद रक्खा है

रुका रहता है चारों सम्त अश्क ओ आह का मौसम
रवाँ हर लहज़ा कारोबार-ए-अब्र-ओ-बाद रक्खा है

फिर इस की कामयाबी का कोई इम्कान ही क्या हो
अगर उस शोख़ पर दा'वा ही बे-बुनियाद रक्खा है

ख़िज़ाँ के ख़ुश्क पत्ते जिस में दिन-भर खड़खड़ाते हैं
इसी मौसम का नाम अब के बहार-ईजाद रक्खा है

ये क्या कम है कि हम हैं तो सही फ़ेहरिस्त में उस की
भले ना-शाद रक्खा है कि हम को शाद रक्खा है

जिसे लफ़्ज़-ए-मोहब्बत के म'आनी तक नहीं आते
उसे अपने लिए हम ने यहाँ उस्ताद रक्खा है

जवाब अपने को चाहे जो भी वो मल्बूस पहनाए
सवाल इस दिल ने उस के आगे मादर-ज़ाद रक्खा है

'ज़फ़र' इतना ही काफ़ी है जो वो राज़ी रहे हम पर
कमर अपनी पे कोई बोझ हम ने लाद रक्खा है