उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na phal na phul na saya shajar mein baqi hai

न फल न फूल न साया शजर में बाक़ी है

نہ پھل نہ پھول نہ سایا شجر میں باقی ہے

शायर: Zafar Zaidi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न फल न फूल न साया शजर में बाक़ी है
मगर वो सूखा हुआ पेड़ घर में बाक़ी है

गिरे मकान को सदियाँ गुज़र गईं लेकिन
पर अब भी ख़ौफ़ सा दीवार-ओ-दर में बाक़ी है

अभी है देर यहाँ इंक़लाब आने में
बड़ा सुकूत अभी शोर-ओ-शर में बाक़ी है

तुम आना चाहो पलट कर तो आ भी सकते हो
हर एक नक़्श-ए-क़दम रहगुज़र में बाक़ी है

यही बहुत है कि हम महफ़िलों में मिलते रहें
मोहब्बतों का भरम तो नज़र में बाक़ी है

न चाहने में भी जी चाहता है मिलने को
कमी सी कोई तो ख़ैर-ओ-ख़बर में बाक़ी है

अभी से हिम्मत-ए-परवाज़ तू न छोड़ 'ज़फ़र'
अभी तो जान तिरे बाल-ओ-पर में बाक़ी है