उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na koi zaKHm laga hai na koi dagh paDa hai

न कोई ज़ख़्म लगा है न कोई दाग़ पड़ा है

نہ کوئی زخم لگا ہے نہ کوئی داغ پڑا ہے

शायर: Zafar Iqbal4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न कोई ज़ख़्म लगा है न कोई दाग़ पड़ा है
ये घर बहार की रातों में बे-चराग़ पड़ा है

अजब नहीं यही कैफ़-आफ़रीं हो शाम-ए-अबद तक
जो ताक़-ए-सीना में इक ख़ून का अयाग़ पड़ा है

कभी रुलाएगी उस यार-ए-बेवफ़ा की तमन्ना
जो ज़िंदगी है तो सद लम्हा-ए-फ़राग़ पड़ा है

ये एक शाख़चा-ए-ग़म से इतने फूल झड़े हैं
कभी क़रीब से गुज़रो तो एक बाग़ पड़ा है