उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na koi chhat na koi saeban rakhte hain

न कोई छत न कोई साएबान रखते हैं

نہ کوئی چھت نہ کوئی سائبان رکھتے ہیں

शायर: Zafar Mahmood zafar11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न कोई छत न कोई साएबान रखते हैं
हम अपने सर पे खुला आसमान रखते हैं

बचा के हम ये बुज़ुर्गों की शान रखते हैं
नहीं है शम्अ' मगर शम्अ-दान रखते हैं

गले भी मिलते हैं हाथों को भी मिलाते हैं
ग़ज़ब की दूरी भी हम दरमियान रखते हैं

ख़ुदाया तेरा करम है कि कुछ न रखते हुए
हम अपनी मुट्ठी में सारा जहान रखते हैं

शराफ़तों से तअल्लुक़ नहीं है कुछ उन का
वो नीचे लोग जो ऊँचा मकान रखते हैं

ज़माना किस लिए हम को तलाश करता है
न कोई नाम न हम कुछ निशान रखते हैं

बहुत सँभाल के रखना क़दम तुम उन पर भी
तुम्हें ख़बर नहीं पत्थर भी जान रखते हैं

अमीर-ए-शहर की दावत क़ुबूल करते नहीं
तिरे फ़क़ीर बड़ी आन बान रखते हैं

मिज़ाज किस ने बिगाड़ा हमारे बच्चों का
क़लम के बदले ये तीर-ओ-कमान रखते हैं

ख़ुदा का शुक्र कि टूटे हुए हैं पर फिर भी
हम अपने ज़ेहन में ऊँची उड़ान रखते हैं

'ज़फ़र' उन्हें भी कभी तुम पढ़ो उन्हें भी सुनो
ख़मोश लब भी कई दास्तान रखते हैं