उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham se gar aashna nahin hota

ग़म से गर आश्ना नहीं होता

غم سے گر آشنا نہیں ہوتا

शायर: Zafar Mahmood zafar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़म से गर आश्ना नहीं होता
आदमी काम का नहीं होता

इक नया रास्ता निकलता है
जब कोई रास्ता नहीं होता

आदमी से ख़ता भी होती है
आदमी देवता नहीं होता

मय-कदे में सब एक होते हैं
कोई छोटा बड़ा नहीं होता

इश्क़ में जंग में सियासत में
कुछ भी हो नारवा नहीं होता

ज़ीस्त में वो घड़ी भी आती है
जब कोई आश्ना नहीं होता

जब वो मेरे क़रीब होते हैं
मुझ को अपना पता नहीं होता

है अजब दौर बेवफ़ाई का
कोई वा'दा वफ़ा नहीं होता

हम न देखें ये और बात 'ज़फ़र'
वो कहाँ रूनुमा नहीं होता