उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHizan ke dosh pe rakhta hai wo bahaar ka rang

ख़िज़ाँ के दोष पे रखता है वो बहार का रंग

خزاں کے دوش پہ رکھتا ہے وہ بہار کا رنگ

शायर: Zafar Mahmood zafar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़िज़ाँ के दोष पे रखता है वो बहार का रंग
अजब है उस की निगाहों में इंतिज़ार का रंग

अजब है रस्म-ए-वफ़ा और ए'तिबार का रंग
कि दिल में बन के धड़कता है उस के प्यार का रंग

सुकून-ए-दिल का ठिकाना कहीं न मिल पाया
बसा हुआ है निगाहों में जो दयार का रंग

लबों पे झूटा तबस्सुम नमी सी आँखों में
अयाँ है चेहरे से उस के फ़िराक़-ए-यार का रंग

अमीर-ए-शहर को हम बे-कसों से क्या मतलब
उसे तो चाहिए बस अपने इक़्तिदार का रंग

हमारी क़ौम को पढ़ने दो क़िस्से माज़ी के
ख़बर तो होने दो क्या था सलीब-ओ-दार का रंग

नहीं था शौक़ मुझे हिजरतों का कोई 'ज़फ़र'
दयार-ए-ग़ैर में ले आया रोज़गार का रंग