उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chaDha hua hai jo suraj wo Dhal bhi sakta hai

चढ़ा हुआ है जो सूरज वो ढल भी सकता है

چڑھا ہوا ہے جو سورج وہ ڈھل بھی سکتا ہے

शायर: Zafar Mahmood zafar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चढ़ा हुआ है जो सूरज वो ढल भी सकता है
हवा-ए-वक़्त का रुख़ तो बदल भी सकता है

ख़मोश लब है जो दरिया तो ख़ैर है सब की
बिगड़ गया तो वो बस्ती निगल भी सकता है

चलो ऐ तिश्ना-लबो हम उठाएँ दस्त-ए-दुआ'
कि आसमान दुआ से पिघल भी सकता है

मनाओ जश्न मुकम्मल बहार आने पर
अभी नया सा है मौसम बदल भी सकता है

वो फूल जैसा बदन चाँदनी से है डरता
कि चाँदनी में बदन उस का जल भी सकता है

तुम्हें तो शौक़ है फूलों के साथ रहने का
हमारा अज़्म जो काँटों पे चल भी सकता है

है आसमाँ की बुलंदी में घर 'ज़फ़र' जिस का
ज़मीं की हद से वो बाहर निकल भी सकता है