उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muslim hun par KHud pe qabu rahta hai

मुस्लिम हूँ पर ख़ुद पे क़ाबू रहता है

مسلم ہوں پر خود پہ قابو رہتا ہے

शायर: Liaqat Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुस्लिम हूँ पर ख़ुद पे क़ाबू रहता है
मेरे अंदर भी इक हिन्दू रहता है

कोई जादूगर के बाज़ू काट भी दे
उस के हाथ में फिर भी जादू रहता है

रात गए तक बच्चे दौड़ते रहते हैं
मेरे कमरे में इक जुगनू रहता है

'मीर' का दीवाना 'ग़ालिब' का शैदाई
मेरी बस्ती में इक साधू रहता है

उस के लबों पर इंग्लिश विंग्लिश रहती है
मेरे होंट पे उर्दू उर्दू रहता है

अक़्ल हज़ारों भेस बदलती रहती है
ये दिल मर जाने तक बुद्धू रहता है