उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kitna dushwar hai jazbon ki tijarat karna

कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना

کتنا دشوار ہے جذبوں کی تجارت کرنا

शायर: Liaqat Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना
एक ही शख़्स से दो बार मोहब्बत करना

जिस को तुम चाहो कोई और न चाहे उस को
इस को कहते हैं मोहब्बत में सियासत करना

सुरमई आँख हसीं जिस्म गुलाबी चेहरा
इस को कहते हैं किताबत पे किताबत करना

दिल की तख़्ती पे भी आयात लिखी रहती हैं
वक़्त मिल जाए तो उन की भी तिलावत करना

देख लेना बड़ी तस्कीन मिलेगी तुम को
ख़ुद से इक रोज़ कभी अपनी शिकायत करना

जिस में कुछ क़ब्रें हों कुछ चेहरे हों कुछ यादें हों
कितना दुश्वार है उस शहर से हिजरत करना