उर्दू शायरी · ग़ज़ल

musafiron ka kabhi etibar mat karna

मुसाफ़िरों का कभी ए'तिबार मत करना

مسافروں کا کبھی اعتبار مت کرنا

शायर: Qaisarul Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुसाफ़िरों का कभी ए'तिबार मत करना
जहाँ कहा था वहाँ इंतिज़ार मत करना

में नींद हूँ मिरी हद है तुम्हारी पलकों तक
बदन जला के मिरा इंतिज़ार मत करना

में बच गया हूँ मगर सारे ख़्वाब डूब गए
मिरी तरह भी समुंदर को पार मत करना

बहा लो अपने शहीदों की क़ब्र पर आँसू
मगर ये हुक्म है कतबे शुमार मत करना

हवा अज़ीज़ है लेकिन ये उस की ज़िद क्या है
तुम अपने घर के चराग़ों को प्यार मत करना

ये वक़्त बंद दरीचों पे लिख गया 'क़ैसर'
मैं जा रहा हूँ मिरा इंतिज़ार मत करना