उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muntashir zehn ki sochon ko ikaTTha kar do

मुंतशिर ज़ेहन की सोचों को इकट्ठा कर दो

منتشر ذہن کی سوچوں کو اکٹھا کر دو

शायर: Qaisarul Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुंतशिर ज़ेहन की सोचों को इकट्ठा कर दो
तुम जो आ जाओ तो शायद मुझे तन्हा कर दो

दर-ओ-दीवार पे पढ़ता रहूँ नौहा कल का
इस उजाले से तो बेहतर है अंधेरा कर दो

ऐ मिरे ग़म की चटानो कभी मिल कर टूटो
इस क़दर ज़ोर से चीख़ो मुझे बहरा कर दो

जा रहे हो तो मिरे ख़्वाब भी लेते जाओ
दिल उजाड़ा है तो आँखों को भी सहरा कर दो

कुछ नहीं है तो ये पिंदार-ए-जुनूँ है केसर
तुम को मिल जाए गिरेबाँ तो तमाशा कर दो