उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe ye Dar hai ki ab bas yahi na kar baiThun

मुझे ये डर है कि अब बस यही न कर बैठूँ

مجھے یہ ڈر ہے کہ اب بس یہی نہ کر بیٹھوں

शायर: Aadarsh Dubey7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे ये डर है कि अब बस यही न कर बैठूँ
तिरी ख़ुशी में कहीं ख़ुद-कुशी न कर बैठूँ

वो सुन के इस लिए मुझ को जवाब देता नहीं
सवाल उस से कोई आख़िरी न कर बैठूँ

मैं जिस को ढूँड रहा था वो मिल गया मुझ में
तमाम शिकवे गिले आज ही न कर बैठूँ

हर एक सम्त मुझे तू दिखाई देता है
मैं एक 'इश्क़ के पीछे कई न कर बैठूँ

बड़े जतन से बनाया है उस ने जिस को ख़ुदा
कहीं मैं छू के उसे आदमी न कर बैठूँ

चले भी आओ के इक रोज़ ये भी मुमकिन है
तुम्हारे नाम मैं ये ज़िंदगी न कर बैठूँ

कुछ इस लिए भी तवज्जोह-तलब ज़ियादा हूँ
जो कह रहा हूँ कहीं वाक़'ई न कर बैठूँ