उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe koi kyon sameTe meri raushni mein kya hai

मुझे कोई क्यों समेटे मिरी रौशनी में क्या है

مجھے کوئی کیوں سمیٹے مری روشنی میں کیا ہے

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे कोई क्यों समेटे मिरी रौशनी में क्या है
वो चराग़-ए-रहगुज़र हूँ जो पस-ए-सहर जला है

कोई ऐसा हादिसा हो कि मुझी को दफ़्न कर दे
जो तरस-तरस के बरसे वो ग़ुबार-ए-दर्द क्या है

तिरे ज़ेहन का धुआँ भी न छुपा सका वो मंज़र
जिसे काट कर गिराया वो शजर वहीं खड़ा है

मुझे क्या दिखा रहे हो मिरा दाग़-ए-ना-रसाई
मिरी जुस्तुजू से पूछो कोई रास्ता बचा है

मुझे डर है आसमाँ भी कहीं ज़द में आ न जाए
तह-ए-ख़ाक जो लहू है वो ज़मीं की बद-दुआ' है

तिरे तेशा-ए-जुनूँ से हैं लहू-लहू चटानें
अरे कुछ तो सोचना था तह-ए-संग आइना है

तुझे भूलने में शायद मिरी उम्र बीत जाए
तुझे भूलने से पहले मुझे ख़ुद को भूलना है

न कहीं किताब में हूँ न किसी के दिल में 'क़ैसर'
मैं ख़याल-ए-राएगाँ हूँ मुझे कौन सोचता है