उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe KHadsha hai apni chashm-e-tar se

मुझे ख़दशा है अपनी चश्म-ए-तर से

مجھے خدشہ ہے اپنی چشم تر سے

शायर: Zafar Akbarabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे ख़दशा है अपनी चश्म-ए-तर से
कहीं पानी गुज़र जाए न सर से

जला दी हैं अभी से मैं ने शमएँ
मुझे है इन्तिज़ार-ए-शब सहर से

सफ़ीने वाक़ई हों गर सफ़ीने
तो कब मरऊब होते हैं भँवर से

हुआ यूँ दरमियाँ हाइल ज़माना
हम ओझल हो गए अपनी नज़र से

उन्हें दाद-ए-सफ़र देती है मंज़िल
जो घबराते नहीं तूल-ए-सफ़र से

तिरे आगे कोई क्या लब-कुशा हो
धड़क उठते हैं दिल तेरी नज़र से

बहुत सहरा को थीं जिन से उमीदें
वो बादल भी 'ज़फ़र' गुलशन पे बरसे