उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi use to kabhi KHud ko dekhte rahna

कभी उसे तो कभी ख़ुद को देखते रहना

کبھی اسے تو کبھی خود کو دیکھتے رہنا

शायर: Zafar Akbarabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी उसे तो कभी ख़ुद को देखते रहना
इसी मदार में दिन रात घूमते रहना

हम अपना फ़र्ज़ करेंगे अदा ब-हर सूरत
हमारा काम है राहें तराशते रहना

वो महव होना मिरा शाम से तिरी धुन में
तमाम रात तिरी राह देखते रहना

न होने देना कभी पस्त हौसलों की फ़सील
कमंद चाँद सितारों पे डालते रहना

उठाए रखना इसी इक उसूल का परचम
बुरा न करना भला सब का चाहते रहना

नजात तीरा-शबी से जो चाहते हो 'ज़फ़र'
नुक़ूश-ए-सुब्ह-ए-दरख़्शाँ उभारते रहना