उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ki purshish-e-gham bar ho gai hogi

किसी की पुरशिश-ए-ग़म बार हो गई होगी

کسی کی پرشش غم بار ہو گئی ہوگی

शायर: Zafar Akbarabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी की पुरशिश-ए-ग़म बार हो गई होगी
तमाम दुख हमा आज़ार हो गई होगी

शदीद मौत की यलग़ार हो गई होगी
हयात रेत की दीवार हो गई होगी

वो एक चीज़ शराफ़त से जो इबारत है
हमारी रात की दीवार हो गई होगी

हदीस-ए-दिल लब-ए-इज़हार के तवस्सुत से
हदीस-ए-कूचा-ओ-बाज़ार हो गई होगी

तबीअ'त अपनी जो आज़ार से नहीं भरती
हरीस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार हो गई होगी

उठी जो होगी कभी दिल से कोई दर्द की लहर
हरीफ़-ए-दीदा-ए-ख़ूँ-बार हो गई होगी

जो हम पे साया-ए-अदबार है तो सुस्त ज़रूर
हमारे काम की रफ़्तार हो गई होगी

ये ज़िल्लतों की जो भर-मार है तो अपनी ख़ता
उसी सज़ा की सज़ा-वार हो गई होगी

जवाब में मिरी कोताह-दस्तियों के 'ज़फ़र'
बुलंद और वो दीवार हो गई होगी