उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe aagahi ka nishan samajh ke miTao mat

मुझे आगही का निशाँ समझ के मिटाओ मत

مجھے آگہی کا نشاں سمجھ کے مٹاؤ مت

शायर: Yasmeen Hameed7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे आगही का निशाँ समझ के मिटाओ मत
ये चराग़ जलने लगा है इस को बुझाओ मत

मुझे जागना है तमाम उम्र इसी तरह
मुझे सुब्ह-ओ-शाम के सिलसिले में मिलाओ मत

मुझे इल्म है मिरे ख़ाल-ओ-ख़द में कमी है क्या
मुझे आइने का तिलिस्म कोई दिखाओ मत

मुझे देख लेने दो सुब्ह-ए-फ़र्दा की रौशनी
मिरी आँख से अभी हाथ अपना हटाओ मत

वही पेड़ है वही शाख़ है वही नाम है
जो गिरा है फूल यहाँ से उस को उठाओ मत

मुझे तह में जा के उछालने हैं गुहर कई
मैं हूँ मुतमइन मुझे डूबने से बचाओ मत

तुम्हें बे-मक़ाम रफ़ाक़तों की तलाश है
मिरा शहर शहर-ए-सबात है यहाँ आओ मत