उर्दू शायरी · ग़ज़ल

daulat-e-dard sameTo ki bikharne ko hai

दौलत-ए-दर्द समेटो कि बिखरने को है

دولت درد سمیٹو کہ بکھرنے کو ہے

शायर: Yasmeen Hameed6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दौलत-ए-दर्द समेटो कि बिखरने को है
रात का आख़िरी लम्हा भी गुज़रने को है

ख़िश्त-दर-ख़िश्त अक़ीदत ने बनाया जिस को
अब्र-ए-आज़ार उसी घर पे ठहरने को है

किश्त-ए-बर्बाद से तजदीद-ए-वफ़ा कर देखो
अब तो दरियाओं का पानी भी उतरने को है

अपनी आँखों में वही अक्स लिए फिरते हैं
जैसे आईना-ए-मक़्सूम सँवरने को है

जो डुबोएगी न पहुँचाएगी साहिल पे हमें
अब वही मौज समुंदर से उभरने को है

कुंज-ए-तन्हाई में खिलता है तख़य्युल मेरा
और मैं ख़ुश हूँ कि ये गुल फिर से निखरने को है