उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko mujhse hi juda karti hai

मुझ को मुझ से ही जुदा करती है

مجھ کو مجھ سے ہی جدا کرتی ہے

शायर: Aadarsh Dubey7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को मुझ से ही जुदा करती है
वो मुझे रोज़ नया करती है

बाद में रखती है कोई मरहम
पहले वो ज़ख़्म हरा करती है

कोई तो है जो मिरे इस दिल को
एक ख़त रोज़ लिखा करती है

हम वो उजड़ी हुई बस्ती जिस के
बद-दुआ' साथ रहा करती है

रिश्ता कोई भी हो लेकिन औरत
अपना हर फ़र्ज़ अदा करती है

जब भी हाथों में उठाता हूँ क़लम
तेरी तस्वीर बना करती है

मैं अभी उस को नहीं जान सका
जो मिरे हक़ में दुआ करती है