उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko dushwar tha bijnor se dilli ka safar

मुझ को दुश्वार था बिजनौर से दिल्ली का सफ़र

مجھ کو دشوار تھا بجنور سے دلی کا سفر

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को दुश्वार था बिजनौर से दिल्ली का सफ़र
सोच फिर कैसे किया मैं ने स’ऊदी का सफ़र

मिल गया है मिरे ख़्वाबों को हक़ीक़त का चराग़
ये अलग बात किया देर से जल्दी का सफ़र

ख़ुश्क आँखों का सफ़र सख़्त पड़ा है जितना
उतना दुश्वार नहीं था मुझे पानी का सफ़र

बाँध देता है कोई पर मिरे ला कर हर रोज़
रोज़ करता हूँ मैं ख़्वाबों में बुलंदी का सफ़र

उस के सीने से लगा मैं तो खुली क़ब्र में आँख
ख़त्म ही हो गया बोतल पे शराबी का सफ़र

बरसर-ए-जंग ग़ुलामों पे भरोसा कर के
ख़ुद ही आसान किया हम ने तबाही का सफ़र

उस के रौज़े के क़रीं मिल गई थोड़ी सी जगह
यूँ मुकम्मल हुआ इक आग के राही का सफ़र