उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujh diye par ye ek ata rahi hai

मुझ दिये पर ये इक 'अता रही है

مجھ دیے پر یہ اک عطا رہی ہے

शायर: Faisal Nadeem Faisal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ दिये पर ये इक 'अता रही है
ख़ुद मुहाफ़िज़ मिरी हवा रही है

लोग सहमे हुए हैं हिजरत से
धूल चेहरों पे मुस्कुरा रही है

तेरे ईमान का ख़ुदा-हाफ़िज़
तू उसे नाम से बुला रही है

शोर हर गाम कामयाब रहा
ख़ामुशी ग़म में मुब्तला रही है

वक़्त पर कार बन गया सो यहाँ
बेबसी दाएरे बना रही है

इस त'अल्लुक़ पे मौत वाजिब थी
दोस्ती दरमियान आ रही है

इस का रद्द-ए-'अमल भी ध्यान में रख
तू अगर मसअला उठा रही है

हम ग़रीबों की 'उम्र भर 'फ़ैसल'
पहली तरजीह बस अना रही है