उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujh diwane ki sukunat ke liye kafi hai

मुझ दिवाने की सुकूनत के लिए काफ़ी है

مجھ دوانے کی سکونت کے لیے کافی ہے

शायर: Faheem Zia5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ दिवाने की सुकूनत के लिए काफ़ी है
दश्त-दर-दश्त ये वहशत के लिए काफ़ी है

मैं ने कब तुझ से ख़ुदा चाँद सितारे माँगे
इक दिया रात की ज़ुल्मत के लिए काफ़ी है

वस्ल की शाम तिरे हिज्र का दर वा होगा
ये ख़ुशी दिल की अज़िय्यत के लिए काफ़ी है

दश्त में ख़ाक उड़ाने नहीं जाता मैं अब
मेरा हुजरा मिरी वहशत के लिए काफ़ी है

झाँकता हूँ तो नज़र अर्ज़-ओ-समा आते हैं
दिल का आईना ही हैरत के लिए काफ़ी है