उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ghaDi kar-e-mohabbat mein fughan hona tha

हर घड़ी कार-ए-मोहब्बत में फ़ुग़ाँ होना था

ہر گھڑی کار محبت میں فغاں ہونا تھا

शायर: Faheem Zia6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर घड़ी कार-ए-मोहब्बत में फ़ुग़ाँ होना था
अश्क बन कर मुझे आँखों से रवाँ होना था

'इश्क़-ज़ादों से कहाँ कार-ए-जहाँ होना था
हो भी जाता तो सलीक़े से कहाँ होना था

क्या ख़बर थी कि ये चौपाल उजड़ जाएगी
एक क़िस्सा तो अभी और बयाँ होना था

आग नफ़रत की लगाई है हमेशा तुम ने
एक दिन शहर की गलियों को धुआँ होना था

हज़रत-ए-शैख़ उन्हें सू-ए-हरम ले आए
मय-कदे जा के जिन्हें पीर-ए-मुग़ाँ होना था

अपनी क़िस्मत में नहीं था कि सहर करते हम
हम चराग़ों को सर-ए-शाम धुआँ होना था