उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek chehre ko musalsal sochta rahta hun main

एक चेहरे को मुसलसल सोचता रहता हूँ मैं

ایک چہرے کو مسلسل سوچتا رہتا ہوں میں

शायर: Faheem Zia6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक चेहरे को मुसलसल सोचता रहता हूँ मैं
महफ़िलों में इन दिनों ख़ामोश सा रहता हूँ मैं

देता रहता है सदाएँ कार-ए-दुनिया 'इश्क़ में
आ रहा हूँ आ रहा हूँ टालता रहता हूँ मैं

हँसते रहते हैं ग़रीबों के दुखों पर अहल-ए-ज़र
बे-हिसों को ख़ामुशी से देखता रहता हूँ मैं

लिख दिया है उस ने क़िस्मत में मिरी दुख ना-तमाम
जिस्म सो जाता है मेरा जागता रहता हूँ मैं

हँस पड़ूँ तो भीग जाती हैं मिरी आँखें 'फहीम'
क़हक़हों को चश्म-ए-नम से देखता रहता हूँ मैं

कट ही जाती है शब-ए-तन्हाई भी मेरी 'फहीम'
आप अपने आप से ही बोलता रहता हूँ मैं