उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum mohabbat mein mohabbat ke gunah-gar hue

हम मोहब्बत में मोहब्बत के गुनह-गार हुए

ہم محبت میں محبت کے گنہگار ہوئے

शायर: Faheem Zia7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम मोहब्बत में मोहब्बत के गुनह-गार हुए
या'नी इक और मोहब्बत में गिरफ़्तार हुए

बर्फ़ पिघली है पहाड़ों पे बड़ी मुश्किल से
मुद्दतों बा'द तिरे आने के आसार हुए

हर घड़ी रहता था एहसास घुटन का तुझ बिन
घर में आते ही तिरे कमरे हवा-दार हुए

नाम लेते हैं 'अक़ीदत से हमारा 'उश्शाक़
चूँ-कि हम लोग मोहब्बत में वफ़ा-दार हुए

तुम को ये फ़ख़्र कि शाहों के मुसाहिब तुम हो
हम को ये ज़ो'म कि 'ग़ालिब' के तरफ़-दार हुए

इक ज़माने ने दु'आओं में हमें माँगा है
हम मगर फिर भी तिरे दोस्त तलब-गार हुए

रिफ़'अतें मुल्क-फ़रोशों ने यहाँ पाई हैं
ज़ीनत-ए-दार मगर हम से वफ़ा-दार हुए