उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghat mein tez hawaen thin jahan rakkha tha

घात में तेज़ हवाएँ थीं जहाँ रक्खा था

گھات میں تیز ہوائیں تھیں جہاں رکھا تھا

शायर: Faheem Zia5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घात में तेज़ हवाएँ थीं जहाँ रक्खा था
क्या गिला तुझ से मुक़द्दर में धुआँ रक्खा था

मैं वहाँ था ही नहीं यार जहाँ रक्खा था
ठीक से याद नहीं ख़ुद को कहाँ रक्खा था

फिर ख़ुदा जाने ज़माने को पता कैसे चला
हम ने तो 'इश्क़ तिरा दिल में निहाँ रक्खा था

फिर भी हर शख़्स तिरी खोज में मसरूफ़ रहा
तू ने हालाँकि बहुत ख़ुद को 'अयाँ रक्खा था

सोचता हूँ कि हवाओं से शिकायत कैसी
हम चराग़ों के मुक़द्दर में धुआँ रक्खा था