उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHair mango ki kahin ye na ghazab ho jae

ख़ैर माँगो कि कहीं ये न ग़ज़ब हो जाए

خیر مانگو کہ کہیں یہ نہ غضب ہو جائے

शायर: Faheem Zia6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ैर माँगो कि कहीं ये न ग़ज़ब हो जाए
मरकज़-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ शहर-ए-तरब हो जाए

क्या भरोसा है मोहब्बत में 'अजब हो जाए
उस से मिलना ही बिछड़ने का सबब हो जाए

बे-क़रारी में सुलगते हैं मुसलसल दिन रात
'इश्क़ होता है बला-ख़ेज़ ये जब हो जाए

रुत बिछड़ने की है मैं सोचता रहता हूँ यही
क्या ख़बर वो जुदा किस मोड़ पे कब हो जाए

वो किसी रोज़ अगर खोल ले गेसू अपने
'ऐन-मुमकिन है कि फिर दिन में ही शब हो जाए

मेरी ख़ुशियों को न लग जाए कहीं यार नज़र
मेरा हँसना मिरे रोने का सबब हो जाए