उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muddat se dekhne ko jinhen hum taras gae

मुद्दत से देखने को जिन्हें हम तरस गए

مدت سے دیکھنے کو جنہیں ہم ترس گئے

शायर: Qamar Siddiqui7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुद्दत से देखने को जिन्हें हम तरस गए
वो दोस्त वो रफ़ीक़ कहाँ जा के बस गए

भड़की है कैसी आग चमन में ये चार-सू
नफ़रत के नाग अहल-ए-गुलिस्ताँ को डस गए

आए जो तुम क़रीब तो गुलशन महक गया
तुम क्या गए कि आँख से आँसू बरस गए

'आशिक़ हुदूद-ए-‘इश्क़ से आगे निकल गया
अपनी हदों से आगे न अहल-ए-हवस गए

हर शख़्स अपनी ज़ात की तन्हाई में है क़ैद
फिर कैसे आ के तुम मिरी आँखों में बस गए

परवाज़ आसमानों पे करते थे जो परिंद
बाज़ू सिमट गए हैं तो सू-ए-क़फ़स गए

हम को हर एक शख़्स 'क़मर' अजनबी लगा
बचपन के बा'द गाँव जो अब के बरस गए