उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mohabbaton par dil-e-hazin ko nisar karna

मोहब्बतों पर दिल-ए-हज़ीं को निसार करना

محبتوں پر دل حزیں کو نثار کرنا

शायर: Aabid Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मोहब्बतों पर दिल-ए-हज़ीं को निसार करना
है यूँ कि जैसे जुनूँ में ख़ुद ही पे वार करना

अजब नहीं वो भी मेरे रस्ते पे ख़ुद को डाले
वो जिस ने सीखा है क़ाफ़िलों को ग़ुबार करना

वो एक बारिश की मुंतज़िर बे-शुमार आँखें
वो एक तूफ़ाँ का बस्तियों को शुमार करना

मुझे तो उस ने तमाम लम्हे वही दिए हैं
वही जो अहल-ए-जुनूँ को हों इख़्तियार करना

शफ़क़ उतर कर तुम्हारे पल्लू से बंध गई है
जो हो सके तो सहर तलक ये हिसार करना

अज़िय्यतों का ख़मीर ज़ख़्म-ए-निहाँ से उट्ठा
कभी जो चाहा है दिल का सहरा बहार करना