उर्दू शायरी · ग़ज़ल

moajiza ye hai ki manzil ke nishan tak pahunche

मो'जिज़ा ये है कि मंज़िल के निशाँ तक पहुँचे

معجزہ یہ ہے کہ منزل کے نشاں تک پہنچے

शायर: Tahir Hanfi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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मो'जिज़ा ये है कि मंज़िल के निशाँ तक पहुँचे
बर्फ़ के लोग भी सूरज के जहाँ तक पहुँचे

कितने मिट्टी के बदन तेज़ हवाओं के तुफ़ैल
काग़ज़ी नाव में पानी के मकाँ तक पहुँचे

मैं कि ज़ुल्मत में मुक़फ़्फ़ल हूँ कभी मेरे ख़ुदा
सुब्ह की पहली किरन मेरे मकाँ तक पहुँचे

हम वो नादान कि पत्थर के खिलौने लेने
घर से निकले भी तो शीशे की दुकाँ तक पहुँचे

बारिश-ए-अश्क थमी आँख धनक रंग हुई
डूब के दुख के समुंदर में कहाँ तक पहुँचे

यार का हुक्म था दिलदार पे लाज़िम ठहरा
ला-मकाँ छोड़ के मिट्टी के मकाँ तक पहुँचे

मौज-दर-मौज गिरह बाँधने 'ताहिर-हनफ़ी'
हाथ में अश्क लिए आब-ए-रवाँ तक पहुँचे