उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri zindagi ki kitab ka hai har ek waraq yun saja hua

मिरी ज़िंदगी की किताब का है हर इक वरक़ यूँ सजा हुआ

مری زندگی کی کتاب کا ہے ہر اک ورق یوں سجا ہوا

शायर: Sabiha Sumbul7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरी ज़िंदगी की किताब का है हर इक वरक़ यूँ सजा हुआ
कहीं आँसुओं से लिखा हुआ कहीं शोख़ियों से भरा हुआ

मिरी आरज़ुओं की तितलियाँ ये मसल के कौन चला गया
मिरी जन्नतें कहाँ गुम हुईं मिरे ख़्वाब-ज़ारों का क्या हुआ

वही रंग-ओ-नूर की बारिशें वही फूल हैं वही ख़ुशबुएँ
मिरे हम-सफ़ीर कहाँ गए मिरे हम-जलीसों का क्या हुआ

कहीं गुम न हो ये रुसूम में कहीं खो न जाए हुजूम में
ये मिरी जबीन-ए-नियाज़ पर जो है एक सज्दा सजा हुआ

तिरी क़ुर्बतें तिरी चाहतीं सभी नफ़रतों में बदल गईं
मैं तो इब्तिदा से थी बेवफ़ा वो तिरी वफ़ाओं का क्या हुआ

मुझे गुदगुदाता है आज भी तिरे ग़ौरो-ओ-फ़िक्र का सिलसिला
वो शरीर आँखें झुकी झुकी वो क़लम लबों में दबा हुआ

कोई रौशनी की रमक़ नहीं न कोई धुएँ का निशान है
ये दिया भी 'सुम्बुल' 'अजीब है न जला हुआ न बुझा हुआ