उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab azm ke shoalon ko himmat ne hawa di hai

जब अज़्म के शो'लों को हिम्मत ने हवा दी है

جب عزم کے شعلوں کو ہمت نے ہوا دی ہے

शायर: Sabiha Sumbul5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब अज़्म के शो'लों को हिम्मत ने हवा दी है
तूफ़ाँ ने ही साहिल की तस्वीर दिखा दी है

शो'लों से गिला कैसा बिजली से शिकायत क्या
गुलशन के निगहबाँ ने हर शाख़ जला दी है

चाहा था करें उन से कुछ शिकवा-ए-बे-मेहरी
लब हिलने से पहले ही सौगंद खिला दी है

इक वो भी हैं मरते हैं जो नंग-ए-वफ़ा बन कर
हर वार पे हम ने तो क़ातिल को दुआ दी है

काँप उट्ठा है जाने क्यूँ हर तार-ए-नफ़स 'सुम्बुल'
जब मेरे बुज़ुर्गों ने जीने की दुआ दी है