उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaghosh-e-lutf-e-gul se jo mayus ho gae

आग़ोश-ए-लुत्फ़-ए-गुल से जो मायूस हो गए

آغوش لطف گل سے جو مایوس ہو گئے

शायर: Sabiha Sumbul7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आग़ोश-ए-लुत्फ़-ए-गुल से जो मायूस हो गए
हम पत्थरों के सीने पे सर रख के सो गए

कुछ सानेहों ने जश्न-ए-मसर्रत बपा किया
कुछ वाक़ि'आत लोगों की पलकें भिगो गए

आए थे अपने साथ जो बेदारियाँ लिए
अफ़्सोस ये कि आज वही लोग सो गए

दिन तो मशक़्क़तों के सहारे गुज़र गया
शब का वुजूद कर्ब के दरिया डुबो गए

इक शोर था निगल न लें तारीकियाँ हमें
जब रौशनी मिली तो अँधेरों में खो गए

इक रोज़ हम को देख के मैले लिबास में
एहसानमंद लोग भी पत्थर के हो गए

'सुम्बुल' ये आज हम पे 'अजब वक़्त आ पड़ा
अपने भी साथ छोड़ के ग़ैरों के हो गए