उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kash is bhiD mein ek shaKHs hi aisa hota

काश इस भीड़ में इक शख़्स ही ऐसा होता

کاش اس بھیڑ میں اک شخص ہی ایسا ہوتا

शायर: Sabiha Sumbul6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

काश इस भीड़ में इक शख़्स ही ऐसा होता
जिस की आँखों में मिरे दर्द का साया होता

कौन कहता उसे गुम-गश्ता-ए-राह-ए-हस्ती
सुब्ह का भूला अगर शाम को लौटा होता

ढूँढते हम तुझे हाथों की लकीरों में अगर
शह्र में तेरे कोई दस्त-शनासा होता

याद रहते जो अगर 'अहद-ए-गुज़शता के फ़रेब
बहते दरिया पे सराबों का न धोका होता

कोई ऐसा न मिला हाशिया-बर्दारों में
जिस ने गिरती हुई दीवार को रोका होता

पीना पड़ता न हमें ज़ह्र-ए-हक़ाएक़ 'सुम्बुल'
ख़्वाब-ज़ारों से अगर दिल न लगाया होता