उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri shikast tera imtihan na ban jae

मिरी शिकस्त तिरा इम्तिहाँ न बन जाए

مری شکست ترا امتحاں نہ بن جائے

शायर: Qaisarul Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरी शिकस्त तिरा इम्तिहाँ न बन जाए
अना सुपुर्द करे कासा-ए-गदाई भी दे

वो टूटती हुई दुनिया का शोर है या-रब
कि मो'जिज़ा है जो ऐसे में कुछ सुनाई भी दे

बईद क्या है जिसे हम ख़िज़ाँ समझते हैं
बहार बन के ख़राबों को दिलरुबाई भी दे

सर-ए-सलीब ख़मोशी मिरा तरीक़ नहीं
ज़बान दी है तो एहसास-ए-नै-नवाई भी दे

मैं ऐसी सर-फिरी दुनिया को क्या कहूँ 'क़ैसर'
कि संग-ए-राह बने ता’न-ए-ना-रसाई भी दे