उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere nasib mein thi dosto kitab ghalat

मिरे नसीब में थी दोस्तो किताब ग़लत

مرے نصیب میں تھی دوستو کتاب غلط

शायर: G R Kanwal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे नसीब में थी दोस्तो किताब ग़लत
कहीं सवाल ग़लत था कहीं जवाब ग़लत

मिरे हरीफ़ को एहसास इस का था शायद
हुआ था मेरे मुक़ाबिल वो कामयाब ग़लत

मिरे गुनाह से बढ़ कर सज़ा मिली मुझ को
लिखा गया था यक़ीनन मिरा हिसाब ग़लत

क़दम क़दम पे मुझे शर्मसार होना पड़ा
कहीं गुनाह ग़लत था कहीं सवाब ग़लत

'अजीब सिलसिला था ज़िंदगी की रातों का
कभी तो नींद ग़लत थी कभी था ख़्वाब ग़लत

हर एक शख़्स ने धोका मिरी नज़र को दिया
हर एक शख़्स था ओढ़े हुए नक़ाब ग़लत

मैं अपनी तिश्ना-लबी का 'इलाज क्या करता
कहीं तो जाम ग़लत था कहीं शराब ग़लत

मिरी नज़र ही 'कँवल' रौशनी से डरती थी
न आफ़्ताब ग़लत था न माहताब ग़लत