उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere dil mein gardish-e-waqt ke kai daur aise guzar gae

मिरे दिल में गर्दिश-ए-वक़्त के कई दौर ऐसे गुज़र गए

مرے دل میں گردش وقت کے کئی دور ایسے گزر گئے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे दिल में गर्दिश-ए-वक़्त के कई दौर ऐसे गुज़र गए
कि जो उभरे नक़्श थे मिट गए जो मिटे निशाँ थे उभर गए

ज़रा 'अहद-ए-माज़ी को झाँक लूँ ज़रा मोड़ के पीछे भी देख लूँ
मिरा कारवाँ था वो क्या हुआ मिरे हम-सफ़र वो किधर गए

वहीं याद आती हैं सूरतें वही धुँदली धुँदली सी मूरतें
वही ढूँडता हूँ मैं नक़्श-ए-पा कि जो रहगुज़र में बिखर गए

है वही तो हासिल-ए-ज़िंदगी मुझे अब भी उन पे ही नाज़ है
मिरी ज़िंदगी के वो रात दिन तिरी याद में जो गुज़र गए

न रहा वो पहला सा राब्ता नहीं दिल से दिल को वो वास्ता
लिया नाम तेरा किसी ने जब कई दाग़ दिल के उभर गए

मिरे जाम क़ल्ब-ओ-जिगर के थे किसी लहज़ा ख़ाली न रह सके
लिया नाम तेरा किसी ने जब कई दाग़ दिल के उभर गए

मिरे साज़-ए-दिल ज़रा जाग अब मुझे सोए हो गईं मुद्दतें
ये किनारा दिल का ख़मोश है यहाँ कब के तूफ़ाँ उतर गए

इन्हीं जाँ-फ़ज़ा मिरे नग़्मों का ऐ 'हबीब' हश्र ये क्या हुआ
कभी घुट के दिल में ही रह गए कभी लब पे आ के बिखर गए