उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere badan pe saja hai barahnagi ka libas

मिरे बदन पे सजा है बरहनगी का लिबास

مرے بدن پہ سجا ہے برہنگی کا لباس

शायर: Tahir Hanfi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे बदन पे सजा है बरहनगी का लिबास
यही लिबास हुआ मेरी ज़िंदगी का लिबास

मिरा ये जुर्म कि मेरी अना के शानों पर
पड़ा हुआ है ग़म-ए-मर्ग-ए-दोस्ती का लिबास

न मुझ को ख़्वाहिश-ए-हस्ती न आस मरने की
कि अब लबों ने दिखाया है तिश्नगी का लिबास

फ़सील-ए-शहर पे मेरी सदा भी रौशन है
ज़माना फेंकने वाला है तीरगी का लिबास

वो जिस्म-ओ-जाँ को छुपाए तो फिर भी उर्यां है
कि मेरी आँख में रक़्साँ है रहबरी का लिबास

लहू के रंग की सुर्ख़ी बदन की वीरानी
किस एहतिमाम से लाया है आदमी का लिबास

ये गर्म सर्द हवाएँ ये आँधियाँ 'ताहिर'
कि चाक-चाक हुआ अब के आगही का लिबास