उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mera junun-e-mohabbat to koi raaz nahin

मिरा जुनून-ए-मोहब्बत तो कोई राज़ नहीं

مرا جنون محبت تو کوئی راز نہیں

शायर: Jaleel Qidwai8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरा जुनून-ए-मोहब्बत तो कोई राज़ नहीं
तिरे ही पास मगर चश्म-ए-इम्तियाज़ नहीं

सबब ये है जो है तू कैफ़-ए-इश्क़ से महरूम
कि सोज़-ए-इश्क़ तो है दिल में तेरे साज़ नहीं

कुछ और दिन उसे रख आतिश-ए-मोहब्बत पर
कि तेरे शीशा-ए-दिल में अभी गुदाज़ नहीं

वबाल-ए-जाँ हो न क्यों इश्क़ के असीरों को
वो दिल जो तेरी मोहब्बत से सरफ़राज़ नहीं

करम कहूँ इसे क़ुदरत का या सितम समझूँ
कि दिल दिया है मगर कोई दिल-नवाज़ नहीं

बस एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत के मा-सिवा क्या है
सुनें जो वो तो मिरी दास्ताँ दराज़ नहीं

अता-ए-ख़ास है तेरी मिरा ये ज़ौक़-ए-जुनूँ
अता पे नाज़ है मुझ को जुनूँ पे नाज़ नहीं

कोई किसी से ये कह दे कि मेरा इश्क़ 'जलील'
बहाना-साज़ है लेकिन ज़माना-साज़ नहीं