उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mila to manzil-e-jaan mein utarne na diya

मिला तो मंज़िल-ए-जाँ में उतारने न दिया

ملا تو منزل جاں میں اتارنے نہ دیا

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिला तो मंज़िल-ए-जाँ में उतारने न दिया
वो खो गया तो किसी ने पुकारने न दिया

रवाँ दवाँ है यूँही कश्ती-ए-ज़माँ अब भी
मगर वो लम्हा जो दिल ने गुज़ारने न दिया

लगी थी जान की बाज़ी बिसात उलट डाली
ये खेल भी हमें यारों ने हारने न दिया

कोई सदा मिरे सब्र-ओ-सुकूत से न उठी
कोई मज़ा तिरे क़ौल-ओ-क़रार ने न दिया

वही इलाज-ए-शब-ए-सख़्ती-ए-ख़िज़ाँ था 'ज़फ़र'
जो एक फूल किसी नौ-बहार ने न दिया