उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mir ki tarh jo diwana nahin ho sakta

'मीर' की तरह जो दीवाना नहीं हो सकता

میرؔ کی طرح جو دیوانہ نہیں ہو سکتا

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'मीर' की तरह जो दीवाना नहीं हो सकता
उस का इक लफ़्ज़ भी बा-मा'ना नहीं हो सकता

ज़िंदगी तेरे त'आक़ुब में वहाँ आ पहुँचे
लौट कर अब कभी घर जाना नहीं हो सकता

माँ सी हस्ती के कलेजे को जलाने वाले
तुझ से हरगिज़ मिरा याराना नहीं हो सकता

बेवफ़ाई पे नदामत से सिसकते रहिए
सौ जनम रोना भी हर्जाना नहीं हो सकता

जाने किस कर्ब में अश्कों से शराबी ने लिखा
ख़ाना-ए-बादा दवा-ख़ाना नहीं हो सकता

मुझ को क़ुरआन सुना 'मीर' की ग़ज़लें न सुना
कोई जुगनू मिरा पैमाना नहीं हो सकता

काग़ज़ी शम' पे साँसों को लुटा दे 'ताहिर'
इतना नादान तो परवाना नहीं हो सकता