उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere hi dam se mehr-o-wafa ka nishan hai ab

मेरे ही दम से मेह्र-ओ-वफ़ा का निशाँ है अब

میرے ہی دم سے مہر و وفا کا نشاں ہے اب

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरे ही दम से मेह्र-ओ-वफ़ा का निशाँ है अब
तुझ सा अगर नहीं है तो मुझ सा कहाँ है अब

इस हाल को पहुँच गईं दिल की ख़राबियाँ
तेरा मकाँ है अब न ख़ुदा का मकाँ है अब

जाती है आधी रात मगर इस का क्या जवाब
घबरा के वो ये कहते हैं वक़्त-ए-अज़ाँ है अब

सीने से मेरे दस्त-ए-तसल्ली उठाइए
ये भी दिल-ए-नहीफ़ को बार-ए-गराँ है अब

देखो ज़रा सी शर्म ने सब कुछ मिटा दिया
वो आँख वो निगाह वो चितवन कहाँ है अब

क्या लुत्फ़-ए-दोस्ती कि नहीं लुत्फ़-ए-दुश्मनी
दुश्मन को भी जो देखिए पूरा कहाँ है अब

तुम को यक़ीं नहीं तो न हो इस का क्या इलाज
कम-बख़्त 'दाग़' तुम से बहुत बद-गुमाँ है अब