उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mausamon ke shahr mein pani ke ghar ugne lage

मौसमों के शहर में पानी के घर उगने लगे

موسموں کے شہر میں پانی کے گھر اگنے لگے

शायर: Tahir Hanfi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मौसमों के शहर में पानी के घर उगने लगे
चुप हवा की कोख से तन्हा सफ़र उगने लगे

हाथ की रेखाओं में साकित हुए मा'नी-ओ-हर्फ़
उँगलियों की पोर पे ख़ूँ के शजर उगने लगे

ख़्वाहिशों की आग में जलता बदन तपता लहू
सोचते जिस्मों की शाख़ों पर हुनर उगने लगे

मेरी मिट्टी ने मुझे पहचान बख़्शी थी मगर
आँख की पुतली में उजड़े ख़्वाब घर उगने लगे

ज़िंदगी की दौड़ में 'ताहिर' अकेला तो नहीं
वक़्त की रफ़्तार में ज़ख़्मों के पर उगने लगे