उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mausam ka hath hai na hawa hai KHalaon mein

मौसम का हाथ है न हवा है ख़लाओं में

موسم کا ہاتھ ہے نہ ہوا ہے خلاؤں میں

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मौसम का हाथ है न हवा है ख़लाओं में
फिर उस ने क्या तिलिस्म रखा है ख़लाओं में

जो टूटती बिखरती सी रहती है रात दिन
कुछ इस तरह की एक सदा है ख़लाओं में

जारी है रौशनी का सफ़र दूर दूर तक
क्या खेल कोई खेल रहा है ख़लाओं में

मंज़र भी मुख़्तलिफ़ हैं जुदा इस के रंग भी
जिस तरह कोई ख़्वाब-ए-नवा है ख़लाओं में

जारी है कहकशाओं की बारात इस तरह
मेला सा जैसे कोई लगा है ख़लाओं में

सनअत-गरी की रम्ज़ अलग है ज़मीन पर
कारीगरी का राज़ जुदा है ख़लाओं में

रफ़्तार और वक़्त का अंदाज़ा है कुछ और
फ़ितरत की मुख़्तलिफ़ ही अदा है ख़लाओं में

इस काएनात की कोई हद ही नहीं 'ज़फ़र'
अपना ही उस ने तर्ज़ रखा है ख़लाओं में