उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mata-e-hosh luT jaane ke din hain

मता-ए-होश लुट जाने के दिन हैं

متاع ہوش لٹ جانے کے دن ہیں

शायर: G R Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मता-ए-होश लुट जाने के दिन हैं
दिल-ए-नादाँ को समझाने के दिन हैं

मैं हर मौसम में उन से पूछता हूँ
किधर जाऊँ किधर जाने के दिन हैं

नया-पन सर्द होता रहा है
पुरानी आग सुलगाने के दिन हैं

बशर की ज़िंदगी के चार दिन भी
कहाँ जीने के मर जाने के दिन हैं

नहीं हमवार राह-ए-ज़िंदगानी
कभी खोने कभी पाने के दिन हैं

जवानी भी कहाँ है अह्द-ए-इशरत
जवानी में भी ग़म खाने के दिन हैं

'कँवल' इस घर में तो मकतब न खोलो
जहाँ बच्चों के मुस्काने के दिन हैं