उर्दू शायरी · ग़ज़ल

markaz-e-nur pe kajal ka andhera kar le

मरकज़-ए-नूर पे काजल का अंधेरा कर ले

مرکز نور پہ کاجل کا اندھیرا کر لے

शायर: Lucky farooqi Hasrat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मरकज़-ए-नूर पे काजल का अंधेरा कर ले
अपनी पलकों को ज़रा और घनेरा कर ले

ये ज़मीं चाँद की रा'नाई से ना-वाक़िफ़ है
दिल के आँगन में कभी पाँव का फेरा कर ले

हम अलग तरह की रखते हैं तवक़्क़ो' तुझ से
अपनी ज़ुल्फ़ों को बिखेर और सवेरा कर ले

मैं तिरी बाहें झटक कर न चला जाऊँ कहीं
और मज़बूत इस आग़ोश का घेरा कर ले

मेरे सीने में कोई शम'-ए-हवस रौशन है
इस उजाले के तवस्सुल से अंधेरा कर ले

मोम की अन-छूई चिड़िया को यही ख़ौफ़ है बस
बर्फ़ के पेड़ पे सूरज न बसेरा कर ले